तूरजी का झालरा राजस्थान के रंगीन शहर जोधपुर में, गुलाब सागर की पुरानी शहर वाली गलियों के बीच स्थित एक ऐतिहासिक बावड़ी है। बलुआ पत्थर से बनी इसकी संरचना और नीचे उतरती सीढ़ियाँ शहर की पारंपरिक जल-प्रबंधन विरासत की झलक देती हैं। आसपास की सड़कों पर बाज़ार और कारीगरों की दुकानें हैं। यह बावड़ी जोधपुर के तीन सितारा होटल किंग्स रिट्रीट से पैदल लगभग 14 मिनट की दूरी पर है।
- स्थान: मकराना मोहल्ला, सुथारों का बास रोड, गुलाब सागर, जोधपुर।
- क्या है: अठारहवीं सदी में बनी एक ऐतिहासिक बावड़ी।
- आसपास के दर्शनीय स्थल: मेहरानगढ़ किला, जसवंत थड़ा और घंटाघर बाज़ार।
- प्रवेश: Incredible India के अनुसार यह स्थल 24 घंटे खुला रहता है; जाने से पहले आधिकारिक वेबसाइट पर जानकारी जाँच लें।
पुराने शहर में तूरजी का झालरा कहाँ है?

तूरजी का झालरा जोधपुर के पुराने शहर के गुलाब सागर इलाके में स्थित है। इसका पता है: मकराना मोहल्ला, सुथारों का बास रोड, गुलाब सागर, जोधपुर, राजस्थान 342001, भारत।
यह बावड़ी शहर के घनी आबादी वाले हिस्से में है, जिसके चारों ओर पुरानी गलियाँ और दुकानें हैं। पास ही मेहरानगढ़ किला और जोधपुर के दर्शनीय स्थलों में उसका स्थान, जसवंत थड़ा और घंटाघर बाज़ार हैं। इसलिए आप इसे पुराने शहर के अन्य पड़ावों के साथ अपनी सैर में शामिल कर सकते हैं।
तूरजी का झालरा ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

तूरजी का झालरा जोधपुर की पारंपरिक जल-प्रबंधन प्रणालियों की विशेषताओं को सँजोए हुए है और गुलाबी-लाल बलुआ पत्थर से बना है। इसके निर्माण की तारीख को लेकर अलग-अलग जानकारियाँ मिलती हैं: माना जाता है कि यह 1740 के दशक का है, जबकि एक विवरण के अनुसार महाराजा अभय सिंह जी की पत्नी रानी तंवर जी ने इसे 1748 में बनवाया था।
बताया जाता है कि यह बावड़ी लगभग 200 फुट गहरी है। इसकी चारों भुजाएँ अलग-अलग कहानी कहती हैं: एक तरफ़ फ़ारसी चक्र के अवशेष हैं, जिसे कभी पानी खींचने के लिए बैलों की एक जोड़ी चलाती थी; बाकी तीन तरफ़ टेढ़े-मेढ़े ढंग से बनी सीढ़ियाँ हैं।
इसकी नक्काशी और पुराने अलंकरणों में नाचते हाथी, मध्यकालीन शेर, गाय के आकार के जल-प्रवाहक और देवी-देवताओं को दर्शाने वाले आले शामिल हैं। संरक्षण के दौरान कुंड की सफ़ाई की गई और देवताओं, जानवरों व छोटी आकृतियों को दर्शाने वाली लाल बलुआ पत्थर की नक्काशी उजागर हुई।
बावड़ी में प्रवेश के बारे में आपको क्या जानना चाहिए?

Incredible India के अनुसार तूरजी का झालरा 24 घंटे खुला रहता है। खुलने की जानकारी बदल सकती है, इसलिए जाने से पहले आधिकारिक वेबसाइट पर जाँच कर लें।
यहाँ की सीढ़ियाँ कुंड तक नीचे उतरती हैं, इसलिए सीढ़ियों पर चलना यात्रा का अहम हिस्सा है। पत्थर के किनारों और सीढ़ियों पर सावधानी रखें, खासकर बावड़ी के भीतर चलते समय। आसपास का चौक घनी आबादी वाला है और शहर के लोग आज भी इस बावड़ी का इस्तेमाल करते हैं।
तूरजी का झालरा के आसपास की गलियों में क्या देख सकते हैं?

तूरजी का झालरा के आसपास की सड़कों पर बाज़ार और स्थानीय कारीगरों की दुकानें हैं। पास के बाज़ारों में हस्तशिल्प, कपड़े, गहने, मिट्टी के बर्तन और चमड़े का सामान मिलता है। इस तरह आप बावड़ी देखने के साथ पुराने शहर की खरीदारी वाली गलियों में भी घूम सकते हैं।
घंटाघर बाज़ार भी पास का एक आकर्षण है। अगर आप बाज़ारों की गलियों में घूमना चाहते हैं, तो जोधपुर के किन बाज़ारों में जाएँ से आपको यहाँ खरीदारी के विकल्पों की जानकारी मिल सकती है।
बावड़ी को जोधपुर की शहर-सैर के साथ कैसे शामिल करें?
पुराने शहर की सैर में तूरजी का झालरा को एक पड़ाव बनाएँ, फिर घंटाघर बाज़ार या मेहरानगढ़ किले और जसवंत थड़ा जैसे आसपास के दर्शनीय स्थलों की ओर बढ़ें। पुराने शहर में ऐतिहासिक धरोहरों की निर्देशित सैर भी उपलब्ध है।
ज़्यादा विस्तृत रास्ते के लिए आप जोधपुर में एक दिन बिताने की यात्रा-योजना देख सकते हैं, जिसमें पुराने शहर के आसपास के दूसरे पड़ाव भी शामिल हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तूरजी का झालरा किसने बनवाया था?
एक विवरण के अनुसार महाराजा अभय सिंह जी के शासनकाल में रानी तंवर जी ने 1748 में यह बावड़ी बनवाई थी।
यहाँ वास्तुकला की कौन-सी खासियतें देखें?
टेढ़ी-मेढ़ी उतरती सीढ़ियाँ, फ़ारसी चक्र के अवशेष और देवी-देवताओं व जानवरों को दर्शाती पत्थर की नक्काशी देखें।
तूरजी का झालरा के पास के बाज़ारों में क्या मिलता है?
पास के बाज़ारों में हस्तशिल्प, कपड़े, गहने, मिट्टी के बर्तन और चमड़े का सामान मिलता है।
